इन दिनों मैं झाबुआ अंचल में अपनी डॉक्यूमेंटरी के लिए लगातार भ्रमण कर रहा हूं। ये यात्रा मेरे लिए जीवन के अविस्मरणीय अनुभव लेकर आई है। ऐसे-ऐसे लोग मिल रहे हैं, जो भुलाए नहीं जा सकते। आज की कहानी एक ऐसे हनुमान भक्त की है, जिसने चर्च अधिपत्य वाले गांव में हनुमान जी की ध्वजा क़ो गिरने नहीं दिया।


इनसे मिलिए। ये हैं जामा वास्केल। पेशे से किसान हैं। जीवन संघर्षो में तपकर निखरा है। जामा वास्केल का आधा गांव ईसाई हो चुका है। हिन्दू धर्म क़ो मानने वाले अब यहाँ आधे ही बच रहे हैं। जामा हनुमान के भक्त हैं। उनकी इच्छा थी कि गांव में हनुमान मंदिर बनाया जाए।


 इसके लिए उन्होंने बहुत हाथ पैर मारे लेकिन गांव से क़ोई सहायता के लिए तैयार नहीं हुआ। वे पहले भी कोशिश कर चुके थे लेकिन परिवार की सहमति भी नहीं बन पा रही थी। एक दिन उन्होंने अपनी कृषि भूमि का ही एक टुकड़ा पवन पुत्र के लिए काट दिया। उस भूमि के टुकड़े पर जामा प्याज़ उगाने वाले थे।


 एक वर्ष पहले उन्होंने मंदिर निर्माण शुरु किया। पहाड़ तोड़ने वाले माझी के जैसे वे अकेले इस काम में जुट गए। सोचिये एक अकेला आदमी मंदिर बनाने का संकल्प ले लिया। गांव से क़ोई साथ न आया, ऊपर से आधा गाँव ईसाई। फिर साथ आई उनकी पत्नी। मंदिर निर्माण के लिए कर्जा लेना पड़ा। एक वर्ष तक पति-पत्नी इस पुनीत कार्य में लगे रहे। इस हनुमान जयंती पर मंदिर में हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई और अगले ही दिन मैं वास्केल जी से मिला। 


यहाँ फेसबुक पर बहुत सनातन सनातन चलता है। एक पोस्ट डालकर सनातन धर्म निभाया जाता है। एक पार्टी का समर्थन करने से मान लिया जाता है कि सनातन का कर्तव्य पूरा हुआ। 


जामा वास्केल जैसे वनवासी असली सनातन रक्षक हैं। जामा ने इसका ढिंढोरा नहीं पीटा, सोशल मीडिया पर गुणगान नहीं किया। चुपचाप चर्च के सामने सनातन की ध्वजा तान दी ऐसे ही मौन रक्षकों के कंधों पर सनातन इठलाकर चलता है, तुम्हारे पार्टी के झंडे लहराने से नहीं चलता। 


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