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 *गल  बाबजी की लोक परंपरा – झाबुआ अंचल की अनमोल धरोहर* भोंगर्या हाट में धड़कता मन, रंगों से भी गहरा अपनापन। ढोल की थाप, पांवों में आग, फाग गाए भील समाज। होली–धुलेटी हंसे गगन, टेसू फुलों से सजे चरण। गल बाबाजी की छांव तले, प्रकृति बोले अपने ही ढंग। आदिवासी संस्कृति –  निर्मल रूप, माटी, पर्व, प्रेम का स्वरूप। रंग नहीं बस जीवन राग, भोंगर्या है आत्मा का फाग। झाबुआ अंचल, मध्य भारत के आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध क्षेत्र है, जहाँ  गऴ बाबजी की लोक कथा हजारों वर्षों से जीवित है। यह , परंपरा आदिवासी समाज की आत्मीयता, श्रद्धा और सामाजिक एकजुटता का अभिन्न हिस्सा भी है।  *गल बाबजी कौन हैं?* गल बाबजी झाबुआ अंचल के हर गांव में पूजे जाते हैं। इसका मचाननूमा लकड़ियों का ढांचा बना होता है। इन्हें भक्त पहलाद का प्रतीक माना जाता है, जो निरंतर जनमानस में विश्वास, समर्पण और आशा की भावना जगाते हैं। खास बात यह है कि गऴ बाबजी का पर्व धुलेंडी के दिन, यानी होली के अगले दिन मनाया जाता है। गऴ बाबजीको लोक कथाओं और गीतों का अध्ययन करें तो ध्यान आता है भक्त प्रहलाद का अंश या प...