*गल  बाबजी की लोक परंपरा – झाबुआ अंचल की अनमोल धरोहर*

भोंगर्या हाट में धड़कता मन,

रंगों से भी गहरा अपनापन।

ढोल की थाप, पांवों में आग,

फाग गाए भील समाज।

होली–धुलेटी हंसे गगन,


टेसू फुलों से सजे चरण।

गल बाबाजी की छांव तले,

प्रकृति बोले अपने ही ढंग।




आदिवासी संस्कृति –

 निर्मल रूप, माटी, पर्व, प्रेम का स्वरूप। रंग नहीं बस जीवन राग, भोंगर्या है आत्मा का फाग।

झाबुआ अंचल, मध्य भारत के आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध क्षेत्र है, जहाँ  गऴ बाबजी की लोक कथा हजारों वर्षों से जीवित है। यह , परंपरा आदिवासी समाज की आत्मीयता, श्रद्धा और सामाजिक एकजुटता का अभिन्न हिस्सा भी है।


 *गल बाबजी कौन हैं?*

गल बाबजी झाबुआ अंचल के हर गांव में पूजे जाते हैं। इसका मचाननूमा लकड़ियों का ढांचा बना होता है। इन्हें भक्त पहलाद का प्रतीक माना जाता है, जो निरंतर जनमानस में विश्वास, समर्पण और आशा की भावना जगाते हैं। खास बात यह है कि गऴ बाबजी का पर्व धुलेंडी के दिन, यानी होली के अगले दिन मनाया जाता है। गऴ बाबजीको लोक कथाओं और गीतों का अध्ययन करें तो ध्यान आता है भक्त प्रहलाद का अंश या प्रतीक कहा जा सकता है। 


*मन्नत की परंपरा*

जब किसी व्यक्ति को बीमारी या किसी प्रकार की समस्या हो और वह डॉक्टर, वैद्य या अन्य उपायों से निराश हो जाता है, तो वह  गऴ बाबजी के सामने अपनी मनोकामना रखता है। और जब वह मन्नत पूरी हो जाती हैं तब वह व्रत उपवास रखकर तय करता है कि होली के 1 दिन बाद वह गऴ बाबजी को बकरे की बलि अर्पित करेगा। मन्नतधारी हल्दी लगाकर, लाल-सफेद वस्त्रों में सज-धजकर, परिवार के सहयोग से विशेष रीति-रिवाज से तैयार होते हैं। फ़िर सभी लोग मिलकर गऴ बाबजी के स्थान पर आते हैं। 

                                            *पर्व का महत्त्वपूर्ण दिन*


धुलेंडी के दिन दोपहर 12 बजे से मन्नतधारियों का आना शुरू हो जाता है। हाथ में नारियल लिए मन्नतधारी गऴ देवता के मचाननुमा स्थान पर पहुँचते हैं, जो जमीन से करीब 20-25 फीट ऊँचा होता है। वहाँ पर ढोल-मांदल की थाप पर थिरकते और सभी गांववासी गीत गाते-नाचते एकत्र होते हैं। 


मन्नतधारी अपनी पूरी श्रद्धा के साथ बकरे की बलि अर्पित करते हैं। बकरे को गल बाबजी के ऊपर चढ़ाते है। मन्नतधारी को गऴ बाबजी के गोल-गोल सात बार घुमाया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी श्रद्धा, भक्ति और विश्वास से की जाती है। पूरा गांव इस अनूठे पर्व में एकजुट होकर भाग लेता है।

*परंपरा का ऐतिहासिक महत्व*

यह परंपरा आदिवासी समाज में हजारों सालों से चली आ रही है। 

गऴ बाबजी की पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, मानवता और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का प्रतीक है। यह हमारी अस्मिता का प्रतीक है, यह पर्व यह संदेश देता है कि कठिनाइयों के समय में भी विश्वास, सहयोग और धैर्य से हर समस्या का समाधान संभव है।

*समाज और संस्कृति का संगम*

झाबुआ अंचल की गऴ बाबजी परंपरा आदिवासी समाज की श्रेष्ठ परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह पर्व सांस्कृतिक, सामाजिक आस्था और जनमानस की अटूट एकता का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ हर पीढ़ी अपने पूर्वजों से यह विरासत ग्रहण करती आ रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपने जड़ों से जुड़ी रहें और अपनी अस्मिता को संजो कर रखें।



लेखक : राजेंद्र डिंडोड, झाबुआ (सामाजिक कार्यकर्ता)

भारत घुमक्कड़ समाज दर्शन फाउंडेशन झाबुआ 7049276815 

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