भील शादी —
भील शादी — आदिवासी अस्मिता, सामूहिकता और प्रकृति से जुड़ा जीवंत उत्सव भील जनजाति समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि पूरा समाज, रिश्ते-नाते, प्रकृति और पूर्वजों के साथ एक पवित्र जुड़ाव है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जहां हर व्यक्ति—बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, बच्चे, गांव के पटेल, तड़वी, कोतवाल—सभी की अपनी जिम्मेदारी और भूमिका होती है। सामूहिक सहमति और संबंधों का विस्तार शादी तय करना केवल परिवार का निर्णय नहीं, बल्कि दोनों गांवों की सहमति से होता है। यह परंपरा बताती है कि रिश्ते केवल दो घरों के नहीं, पूरे समाज के होते हैं। जिस घर में बेटी जाती है, वहां उसे बहू नहीं बेटी का सम्मान मिलता है, और जहां दामाद जाता है, वहां उसे बेटा माना जाता है। तैयारी और लोकजीवन की झलक शादी की तैयारी में पूरा गांव साथ चलता है—पास के कस्बों से कपड़े, चांदी के आभूषण खरीदे जाते हैं। महिलाएं लोकगीत गाते हुए इस यात्रा को उत्सव बना देती हैं। शाम को गणेश पूजन से शुरुआत होती है, हल्दी लगाई जाती है और दूल्हे को पारंपरिक रूप से सजाया जाता है। धरती माता साक्षी और प्रकृति का सम्मान भील विवाह में धरती...