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भील शादी —

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 भील शादी — आदिवासी अस्मिता, सामूहिकता और प्रकृति से जुड़ा जीवंत उत्सव भील जनजाति समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि पूरा समाज, रिश्ते-नाते, प्रकृति और पूर्वजों के साथ एक पवित्र जुड़ाव है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जहां हर व्यक्ति—बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, बच्चे, गांव के पटेल, तड़वी, कोतवाल—सभी की अपनी जिम्मेदारी और भूमिका होती है। सामूहिक सहमति और संबंधों का विस्तार शादी तय करना केवल परिवार का निर्णय नहीं, बल्कि दोनों गांवों की सहमति से होता है। यह परंपरा बताती है कि रिश्ते केवल दो घरों के नहीं, पूरे समाज के होते हैं। जिस घर में बेटी जाती है, वहां उसे बहू नहीं बेटी का सम्मान मिलता है, और जहां दामाद जाता है, वहां उसे बेटा माना जाता है।  तैयारी और लोकजीवन की झलक शादी की तैयारी में पूरा गांव साथ चलता है—पास के कस्बों से कपड़े, चांदी के आभूषण खरीदे जाते हैं। महिलाएं लोकगीत गाते हुए इस यात्रा को उत्सव बना देती हैं। शाम को गणेश पूजन से शुरुआत होती है, हल्दी लगाई जाती है और दूल्हे को पारंपरिक रूप से सजाया जाता है। धरती माता साक्षी और प्रकृति का सम्मान भील विवाह में धरती...
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  इन दिनों मैं झाबुआ अंचल में अपनी डॉक्यूमेंटरी के लिए लगातार भ्रमण कर रहा हूं। ये यात्रा मेरे लिए जीवन के अविस्मरणीय अनुभव लेकर आई है। ऐसे-ऐसे लोग मिल रहे हैं, जो भुलाए नहीं जा सकते। आज की कहानी एक ऐसे हनुमान भक्त की है, जिसने चर्च अधिपत्य वाले गांव में हनुमान जी की ध्वजा क़ो गिरने नहीं दिया। इनसे मिलिए। ये हैं जामा वास्केल। पेशे से किसान हैं। जीवन संघर्षो में तपकर निखरा है। जामा वास्केल का आधा गांव ईसाई हो चुका है। हिन्दू धर्म क़ो मानने वाले अब यहाँ आधे ही बच रहे हैं। जामा हनुमान के भक्त हैं। उनकी इच्छा थी कि गांव में हनुमान मंदिर बनाया जाए।  इसके लिए उन्होंने बहुत हाथ पैर मारे लेकिन गांव से क़ोई सहायता के लिए तैयार नहीं हुआ। वे पहले भी कोशिश कर चुके थे लेकिन परिवार की सहमति भी नहीं बन पा रही थी। एक दिन उन्होंने अपनी कृषि भूमि का ही एक टुकड़ा पवन पुत्र के लिए काट दिया। उस भूमि के टुकड़े पर जामा प्याज़ उगाने वाले थे।   एक वर्ष पहले उन्होंने मंदिर निर्माण शुरु किया। पहाड़ तोड़ने वाले माझी के जैसे वे अकेले इस काम में जुट गए। सोचिये एक अकेला आदमी मंदिर बनाने का संकल्प ले लिया। गां...
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 *गल  बाबजी की लोक परंपरा – झाबुआ अंचल की अनमोल धरोहर* भोंगर्या हाट में धड़कता मन, रंगों से भी गहरा अपनापन। ढोल की थाप, पांवों में आग, फाग गाए भील समाज। होली–धुलेटी हंसे गगन, टेसू फुलों से सजे चरण। गल बाबाजी की छांव तले, प्रकृति बोले अपने ही ढंग। आदिवासी संस्कृति –  निर्मल रूप, माटी, पर्व, प्रेम का स्वरूप। रंग नहीं बस जीवन राग, भोंगर्या है आत्मा का फाग। झाबुआ अंचल, मध्य भारत के आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं से समृद्ध क्षेत्र है, जहाँ  गऴ बाबजी की लोक कथा हजारों वर्षों से जीवित है। यह , परंपरा आदिवासी समाज की आत्मीयता, श्रद्धा और सामाजिक एकजुटता का अभिन्न हिस्सा भी है।  *गल बाबजी कौन हैं?* गल बाबजी झाबुआ अंचल के हर गांव में पूजे जाते हैं। इसका मचाननूमा लकड़ियों का ढांचा बना होता है। इन्हें भक्त पहलाद का प्रतीक माना जाता है, जो निरंतर जनमानस में विश्वास, समर्पण और आशा की भावना जगाते हैं। खास बात यह है कि गऴ बाबजी का पर्व धुलेंडी के दिन, यानी होली के अगले दिन मनाया जाता है। गऴ बाबजीको लोक कथाओं और गीतों का अध्ययन करें तो ध्यान आता है भक्त प्रहलाद का अंश या प...